झाबुआ सुरेश मुलेवा मूल शिक्षा को धूल कर रहा है अभिभावक!
आज अभिभावक स्वयं अपने बाल्य को मूल शिक्षा से वंचित रखना चाहता है । क्योंकि आज प्रत्येक माता-पिता सामाजिक रूप से अपनी स्थिति को उच्च रखने के तर्ज पर महंगे विद्यालय में शिक्षा दिलवाना एक फैशन सा हो गया है । जिससे वह अपने स्वयं के स्तर को उच्च रखने के लगातार प्रयास में रहता है ।
*** *विद्यालय शिक्षा****
1. कंटेंट मेकर शिक्षा
शिक्षा एक मानवीय तत्व है शिक्षा सिर्फ नौकरी प्राप्त करने का मार्ग ही नहीं है बल्कि जीवन जीने की कला का विकास होना भी है ।अभिभावकों की चाह पर शिक्षकों का स्वरूप बदलकर कुछ विद्यालय में शिक्षकों की जगह कंटेंट क्रिएटर रेडी कर दिए गए हैं ।जहां शिक्षक अब बच्चों को दिनभर रटवाता है ।अब वह बच्चों की क्लास में नहीं देखता है कि बच्चों की विकास की गति क्या है ? क्लासरूम के आउटपुट पर कोई चर्चा नहीं हो रही है ।वह शिक्षक नहीं कंटेंट क्रिएटर बनकर रह गए हैं।
2 .शिक्षा पद्धति में सुधार
बच्चों को पढ़ाना शिक्षकों का काम है ।बच्चों को ट्रेन करना शिक्षकों का नहीं ट्रेनरों का काम है ।आप ट्रेनिंग को आक्रमक कर सकते हैं, शिक्षा को नहीं।
शिक्षा को सहज एवं बाल सुलभ ही रखना होगा। आप ट्रेनिंग की मार्केटिंग कर सकते हैं शिक्षा तो अपनी गति से परिणाम देगी ,जब बच्चा बड़ा होगा।
यदि यह शॉर्टकट इतना ही सही होता तो नासा में अमेरिका और फ्रेंच के वैज्ञानिक अधिक होते, ना कि हमारे यहां से गठित और विज्ञान पड़े हुए।
आज दुनिया में जितने भी ग्लोबल भारतीय CEO हम जिन्हे गिन गिन कर इतराते हैं,ये ना तो CCE से बने, ना ही NEP से और ना ही ONLINE से ,और ना ही कंपटीशन से।
ये सभी आज से 20 से 30 साल पहले पारंपरिक शिक्षा लेकर उस मुकाम तक पहुंचे है।
3.आज की शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों पर जोर क्यों नहीं दिया जाता?
नैतिकता किसी भी समाज या देश का मुख्य आधार होता है। जब मनुष्य के अंदर के मानवता की मृत्यु हो जाती है तब समाज में नैतिकता का पतन हो जाता है।
आज हर तरफ लोग बस इसी कोशिश में लगे हैं कि सामने वाले को कैसे लुटा जाए, निचा दिखाया जाए, जलील किया जाए। प्यार, मोहब्बत, बड़ों का आदर, किसी जरूरतमंद की मदद ये सब समाज से गायब हो चूका है। जब समाज ही अनैतिक हो गया है तो शिक्षा में नैतिक कैसे रहेगा।
शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्य क्यों नहीं है
भारत में शिक्षा आज business हो गया है। आज बच्चे ना गुरु की इज्जत करते हैं और ना गुरु बच्चे को शिष्य समझते हैं। आज का शिक्षक स्कूल में कम पढ़ाता है ताकि बच्चे उसके पास ट्यूशन आ सके।
भारत शिक्षा व्यवस्था का दुर्भाग्य यह है कि सिलेबस से नैतिक शिक्षा को ही हटा दिया।
इंडोनेशिया मुस्लिम देश है फिर भी वहां भगवत गीता पढ़ाया जाता है।
जापान में बच्चे अपने स्कूल की सफाई खुद करते हैं। भारत में गलती से अगर कोई स्कूल में शिक्षक बच्चों से स्कूल की सफाई करवा ले तो माता _पिता खुद शिक्षकों की क्लास ले लेंगे।
शिक्षा क्षेत्र में नैतिक मूल्यों का महत्व उच्च है। इन्हें शिक्षा संस्थानों में समाहित करने के लिए शिक्षकों को नैतिक मूल्यों के महत्व को समझना चाहिए और उन्हें छात्रों को भी इन मूल्यों को सिखाने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- शिक्षा क्षेत्र में नैतिक मूल्यों का महत्व उसके स्वरूप, उद्देश्य और महत्व के आधार पर स्थापित होता है। नैतिक मूल्य शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है, जो छात्रों को एक स्वस्थ, समझदार और संतुलित व्यक्तित्व विकसित करने में मदद करता है। नैतिक मूल्य शिक्षा के माध्यम से छात्रों को समाज में अपनी जगह समझाने के साथ-साथ उन्हें सही और गलत के बीच अंतर को समझने में भी मदद मिलती है।
4.एक्टिविटी का माध्यम का दुरुपयोग
आज कई शिक्षण संस्थान वही गलती कर रहे हैं जो जिधर देखो, दौड़ चल रही है। वीडियो बनाओ ,रियल बनाओ, पेरेंट्स को इंप्रेस करो ,मार्केटिंग करो ।जहां शिक्षा संस्थान में एक्टिविटी को मुख्य शिक्षा का स्वरूप दे दिया गया है जिससे मूल शिक्षा को शून्य स्तर पर ला दिया गया है। जहां विद्यालय किसी भी कक्षा के विशेष विद्यार्थियों के माध्यम से माह में दो या तीन बार एक्टिविटी वीडियो बनाकर अपना अधिकतम समय खर्च करता है । जिस विषय पर एक्टिविटी की जा रही है उसका 50% भी ज्ञान विद्यार्थियों को नहीं होता है अतः इस तरह का ज्ञान खोखला ज्ञान हुआ। परंतु पेरेंट्स जब सोशल मीडिया पर अपने बच्चों को वीडियो तथा रील के माध्यम से देखता है, तो अन्य तरह से उसका ध्यान सिर्फ नाटकीय दिखावे पर चला जाता है क्योंकि भारत की नई पीढ़ी सोशल मीडिया में ही संपूर्ण रूप से व्यस्त है ।जहां एक्टिविटी का माध्यम मानसिक सक्रिय होने और गुणवत्ता को गतिविधि के माध्यम से बड़ाने का तरीका है जो कि शिक्षा के स्तर को उच्च करता है ,बच्चों को ऊर्जावान जीवन ज्ञान को प्रदान करता है , जिससे प्रत्येक विषय का संपूर्ण विकसित ज्ञान विद्यार्थी को प्राप्त हो सके ।
पेरेंट्स की महत्वाकांक्षाओं का बोझ। 1.परसेंट मेकर
आज का पालक अपने बच्चों पर अपनी स्वयं की महत्वाकांक्षाओं का दबाव उस पर बनाकर उन्हें उस मानसिक दबाव के साथ शिक्षा देना चाहता है ,जिसके लिए उसकी अपेक्षाएं सिर्फ बच्चों को पर्सेंट मेकर बनना चाहता है ।ऐसे पेरेंट्स रेसिंग पेरेंट्स कहलाते हैं । जिसका मानसिक दबाव स्वयं के बच्चों पर
संपूर्ण विद्यार्थी जीवन में बना रहता है। ना तो 90% के ऊपर वाले बच्चो का बेस्ट करियर होता है ,और ना ही 60% से कम प्रतिशत वाले बच्चो का कैरियर बुरा होता है ।आप अपने बच्चों का करियर इन परसेंटेज से डिसाइड नहीं कर सकते हैं और ना ही अपने बच्चों की काबिलियत को दूसरे के बच्चों की काबिलियत से तुलना कर सकते हो। यदि आप इतिहास उठाकर देखेंगे कि ऐसे हजारों ,लाखों ,सफलतम लोग मिलेंगे जिन्होंने बहुत कम प्रतिशत से अपना एजुकेशन पूरा किया है यहां तक की कुछ लोग तो फेल होकर भी आज सफलतम जीवन जी रहे हैं। जिसका उदाहरण 12th फेल पिक्चर से हम समझ सकते हैं ।
2. कंपैरिजन
हर एक हिंदुस्तानी परिवार में एक शर्मा का बेटा होता है जिससे हमे बचपन से कम्पेयर किया जाता है। पेरेंट्स हमेशा कहता है कि उसे देखो कितना अच्छा कर रहा है, वह कितने अच्छे मार्क्स ला रहा है ,और कितना अच्छा काम करता है ।हमें हमेशा बचपन से दूसरों लोगों से कंपेयर किया जाता है। चाहे वह हमारे भाई बहन हो सकते है,स्कूल के दोस्त हो सकते हैं, कॉलोनी के दोस्त हो सकते हैं। पेरेंट्स एक परमानेंट पैरामीटर डिसाइड कर लेता है ।जिस पर वह हर समय दूसरों अपने बच्चो को कंपेयर करता है। क्या हम एक ही तराजू से सभी की गुणवत्ता को कैसे देख सकते हैं इसलिए प्रत्येक माता-पिता को अपने बच्चों को दूसरों के बच्चों से तुलना नहीं करनी चाहिए ।बल्कि यह देखें कि वह कल से आज बेहतर कर रहा है या नहीं ।और उसे और बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
3. जिज्ञासा को दबाना
जब बच्चे छोटे होते हैं तो ,बचपन से वह हर विषय के बारे में छोटे-छोटे हजारों सवाल पूछते हैं ।और उनकी जिज्ञासा प्रश्नों के साथ बनी रहती है ।माता-पिता उन जिज्ञासा से भरे सवालों का जवाब नहीं देते ।उन्हें चुप कर देते हैं। और जब उनके सवालों का जवाब भी देते हैं जो उन्हें कहा जाता है कि तुम्हे इतना भी नहीं पता । इस तरह की घटना उसके साथ लगातार होने पर वह यह महसूस करने लगता है कि शायद मुझे ही कुछ पता नहीं है। वह अपने प्रश्नों को नहीं पूछता है ।उसे लगता है कि मैं प्रश्न पूछूंगा तो लोग मुझे बेवकूफ समझेंगे, या मेरी मजाक बनाया जाएगा , खिलली उड़ाई जाएगी। वह अपनी जिज्ञासा को दबाकर अपनी बेसिक क्षमता, बौद्धिक क्षमता को कम कर देता है। बल्कि सच यह है कि जिंदगी में इंसान तभी आगे बढ़ता है ।जब वह सवाल पूछता है ।इसीलिए प्रत्येक माता-पिता को हमेशा हर सवाल का जवाब देकर अपने बच्चों को प्रोत्साहित करना चाहिए।
4. समाज पर ध्यान
हमारे आसपास में रहने वाले लोगों का वह समुह जिसे हम समाज कहते हैं। जिसमे प्रत्येक व्यक्ति समाज में इस तरह उलझा हुआ है । क्योंकि इसमें उनकी गलती नहीं है ,क्योंकि समाज में प्रत्येक कार्य की राय ,परामर्श ,विशेष अनुभव क्षेत्र अनुसार ली जाती है ।परंतु अब वहां दुनिया बदल चुकी है ।अब लोगों का नॉलेज और उनके ज्ञान की क्षमता बढ़ गई है ।वह अधिकतम निर्णय या ज्ञान सभी जगह से प्राप्त कर सकते हैं। इस समाज का डर हमेशा बच्चों को इमोशनली दिया जाता है ।समाज में हम क्या कहेंगे ? समाज में लोग क्या कहेंगे ? समाज में हमारी इज्जत की बात है ।यह प्रेशर कभी भी हमें बच्चों में नहीं बनना चाहिए ।
5. पालकों को चाहिए विनर
पालक हमेशा अपने बच्चों को विनर या रेंकर देखना चाहता है, बल्कि यह बिल्कुल गलत है ।आप उसे इस प्रेशर में नहीं रखें कि तुम्हें विनर ही होना होगा ।बल्कि उसे उसके पिछले बार की तुलना में थोड़ा भी इंप्रूव करता है तो उसे इनकरेज करें और उसे प्रोत्साहित करें ।उसकी तारीफ करें। जिससे उसे अच्छे परिणाम लाने का उत्साह जागृत हो । *6. भरोसा नहीं होना
माता पिता और बच्चो के बीच भरोसा कम होना एक बहुत बड़ा कारण है।वह आप पर भरोसा नहीं कर पाता है। वह अपने सीक्रेट एवं अपने मन की बात को आपको बता ही नहीं पता है। वह अपने अंदर बहुत सी बातों की छुपा कर रखता है ।वह घर के अंदर दोहरी जिंदगी जीना चालू कर देता है ।
दोस्तो के बीच कुछ और परिवार के बीच कुछ और। क्योंकि दोहरे अभिनय के साथ कोई भी सफल नहीं हो पाता है।वह झूठ बोलने की आदत में लिप्त हो जाता है । शिक्षाविद अमित कुमार शुक्ला की कलम स

